
Thursday, July 31, 2008
ताज में सतरंगी चादर

क्षितिज
श्वेत पंखुडियों
सा बिखरा जीवन

आओ भर दो रंग इसे तुम पुष्प बना दो॥
शब्द-शब्द है टूटा, जीवन छंद अधूरा
बनूँ प्रणय का राग मुझे तुम अधर सजा लो....
तुम बिन मिटटी की काया का अस्तित्व कहाँ
काया के बनके प्राण परिचय बोध करा दो॥
भिक्षुक हूँ लेकिन भीख प्रेम की मत देना
सर्वस्व मिटा दो मुझको ख़ुद में समां लो...
जीवन की हर स्वांस समर्पित तुमको ही
दासी समझो या मस्तक का अभिमान बना लो ...
युगों-युगों का इंतजार स्वीकार मुझे,
धरती कहती है गगन से केवल क्षितिज दिखा दो....
Wednesday, July 30, 2008
ओस की एक बूँद

मैं ओस की ऐसी बूँद हूँ जो सूरज को देख नही पाती,
नदिया की धारा स्वप्न मेरा, पत्ते पर ही मैं मिट जाती।
एक रात का है मेरा जीवन, तिनका-तिनका रिसती हूँ मैं
मुझे साथ निशा के जाना है ये सोच सुबह मैं बह जाती॥
मेरे छीन ले गया स्वप्न कोई, मेरी रातें तन्हा रोई हैं,
बिरहन के गाल के आँसू सी चुप भी रहती, कहती जाती॥
मुझे आशाओं से प्यार नहीं, मुझे उम्मीदें मत दिखलाओ,
पल भर में ही बुझ जातीहै दीपक से अलग हुई बाती...
मेरा प्यार गया संसार गया , मेरे स्वप्नों का बाज़ार गया,
मेरा रूप गया श्रृंगार गया, मेरे जीवन का हर सार गया,
मैंने लाख यतन कर देखे हैं पर प्रीत की रीत नही भाती,
जितना तुम ह्रदय लगाओगे धोखा देगा साथी...
किसी सीप का मोती बन जायें, दुनिया से ओझल जाए
जो प्यार किसी का हो न सके वो प्रेम दीवाने हो जायें
मिलन ही होता प्रेम अगर क्यों चकोर दीवानी कहलाती
पा लेती अपने गिरधर को मीरा कैसे पूजी जाती.............
नदिया की धारा स्वप्न मेरा, पत्ते पर ही मैं मिट जाती।
एक रात का है मेरा जीवन, तिनका-तिनका रिसती हूँ मैं
मुझे साथ निशा के जाना है ये सोच सुबह मैं बह जाती॥
मेरे छीन ले गया स्वप्न कोई, मेरी रातें तन्हा रोई हैं,
बिरहन के गाल के आँसू सी चुप भी रहती, कहती जाती॥
मुझे आशाओं से प्यार नहीं, मुझे उम्मीदें मत दिखलाओ,
पल भर में ही बुझ जातीहै दीपक से अलग हुई बाती...
मेरा प्यार गया संसार गया , मेरे स्वप्नों का बाज़ार गया,
मेरा रूप गया श्रृंगार गया, मेरे जीवन का हर सार गया,
मैंने लाख यतन कर देखे हैं पर प्रीत की रीत नही भाती,
जितना तुम ह्रदय लगाओगे धोखा देगा साथी...
किसी सीप का मोती बन जायें, दुनिया से ओझल जाए
जो प्यार किसी का हो न सके वो प्रेम दीवाने हो जायें
मिलन ही होता प्रेम अगर क्यों चकोर दीवानी कहलाती
पा लेती अपने गिरधर को मीरा कैसे पूजी जाती.............
Tuesday, July 29, 2008
तब धूप खिलेगी आँगन में

तब धूप खिलेगी आँगन में
जब चिड़िया के छोटे बच्चे चोंच से दाना खायेंगे
जब गाँव की छोटी नहर में बच्चे नंगे बदन नहाएँगे
हर रात आग को घेर लोग जब आल्हा-ऊदल गायेंगे
तब धूप खिलेगी आँगन में...
जब बसंत में खेतों में पीली सरसों फूलेगी
जब सावन में सखियाँ मिलकर पेड़ों पर झूला झूलेंगी
जब बारिश के पानी से मिट्टी में खुशबु आएगी
तब धूप खिलेगी आँगन में....
सूरज अब भी निकला करता है पर धूप अभी मुरझाई है
जब से दूरी बड़ी दिलों में, धूप लगे अलसाई है,
पर एक दिन ऐसा आएगा जब फर्क न होगा इंसा में मानवता होगी एक जात,
हर दिन तब रंग उडेगा और दीप जलेंगे सारी रात,
खुशियाँ झोली में आएँगी और प्यार की जब होगी बरसात
तब धूप खिलेगी आँगन में, तब धूप खिलेगी आँगन में.....
Sunday, July 27, 2008
नहीं पिया मुझको हक़ कोई
नहीं पिया मुझको हक़ कोई
क्यों सोलह श्रंगार करू मैं
क्यों गजरा महकाऊँ
द्वार पे आहट सुनते ही क्योँ दौडी-दौडी आऊँ
तुझे न पाऊँ तो घबराऊँ
देख तुझे खिल जाऊं
भीतर झट से भाग आईना देख मैं शर्मा जाऊं,
पर, एक नज़र न देखा तुमने देर तलक मैं रोई
नहीं पिया मुझको हक़ कोई ......
कानों की बाली पूछ रही, गालों की लाली पूछ रही
पूछ rahi माथे की बिंदिया, बैनी काली पूछ रही,
चहक-चहक बतियाने वाली, क्योँ रहती खोयी-खोयी
नहीं पिया मुझको हक़ कोंई
आसान कितना होता है ख्वाबों में संसार बसाना
अपनी चूड़ी की खनखन में उसकी धड़कन का घुल मिल जाना
एक नज़र की खातिर जीना एक नज़र मर जाना
एक नज़र की चाहत में मैं सुबह तलक न सोयी
नहीं पिया मुझको हक़ कोंई............
क्यों सोलह श्रंगार करू मैं
क्यों गजरा महकाऊँ
द्वार पे आहट सुनते ही क्योँ दौडी-दौडी आऊँ
तुझे न पाऊँ तो घबराऊँ
देख तुझे खिल जाऊं
भीतर झट से भाग आईना देख मैं शर्मा जाऊं,
पर, एक नज़र न देखा तुमने देर तलक मैं रोई
नहीं पिया मुझको हक़ कोई ......
कानों की बाली पूछ रही, गालों की लाली पूछ रही
पूछ rahi माथे की बिंदिया, बैनी काली पूछ रही,
चहक-चहक बतियाने वाली, क्योँ रहती खोयी-खोयी
नहीं पिया मुझको हक़ कोंई
आसान कितना होता है ख्वाबों में संसार बसाना
अपनी चूड़ी की खनखन में उसकी धड़कन का घुल मिल जाना
एक नज़र की खातिर जीना एक नज़र मर जाना
एक नज़र की चाहत में मैं सुबह तलक न सोयी
नहीं पिया मुझको हक़ कोंई............
Monday, July 21, 2008
जै जै कुर्सी मैया
मनमोहन कुर्सी बचाइए, बिन कुर्सी सब सून,
कुर्सी के बिन नहीं मिले, सोनिया को सुकून।
सांसद- वान्साद जोड़ के, कुर्सी लई बनाय,
चढ़ मनमोहन कह रहे, सरकार लियो बचाय
पाहन पूजे हरी मिले, तो मैं पूजूं पहार
ताते यह कुर्सी भली, बनवादे सरकार
बम भोले का शोर है, एटम बम का जोर
भक्ति-शक्ति साथ ले रहीं मनवा में हिलोर
कुर्सी के बिन नहीं मिले, सोनिया को सुकून।
सांसद- वान्साद जोड़ के, कुर्सी लई बनाय,
चढ़ मनमोहन कह रहे, सरकार लियो बचाय
पाहन पूजे हरी मिले, तो मैं पूजूं पहार
ताते यह कुर्सी भली, बनवादे सरकार
बम भोले का शोर है, एटम बम का जोर
भक्ति-शक्ति साथ ले रहीं मनवा में हिलोर
सत्ता सुख
करार पर रार का रिजल्ट सामने है। सत्ता सुख के लिए पराये अपने हो गये हैं। और अपने पराये। सभी देशहित में फैसले ले रहे हैं। लेकिन इस देशहित का क्या मतलब है, किसी को पता।
Wednesday, July 16, 2008
जिल्लत की जिन्दगी
कहते है बाप के लिए सबसे बड़ा बोझ बेटे की अर्थी को कन्धा देना होता है। लेकिन क्या किसी ने आरुशी के पिता से पूछने की कोशिश की उनका दर्द क्या है। बिना बेटे की अर्थी को कन्धा दिए उसने दुनिया का सबसे बड़ा बोझ उठाया। वह है जिल्लत का। मीडिया के दवाब में पुलिस ने उसे अपने ही जिगर के टुकडे का हत्यारा बना दिया। ये मीडिया ही था जिसने पहले दिन टॉप लीड दी थी कि पापा ने ही मारा आरुशी को। बाद में इसी मीडिया ने दिया कि पापा ने नही मारा आरुशी को। मीडिया ने अपना कम किया और पुलिस ने अपना। बीच में पिसा तो सिर्फ़ अभागा बाप।
Saturday, July 12, 2008
Thursday, July 10, 2008
Tuesday, July 8, 2008
Saturday, July 5, 2008
जिन्दगी
जिन्दगी दर्द भी है, राहत भी
मौत एक वहम है, हकीकत भी
यूँ तो कहने को यह एक पहेली है
सच पूछो तो जिन्दगी मौत की सहेली है।
जिन्दगी पतझड़ है बसंत भी
यह एक महका हुआ चमन भी
यूँ तो कहने को यह एक दिखावा है
सच पूछो तो यह एक खुबसुरत छलावा है।
जिन्दगी खुश है, जिन्दगी उदास भी
यह तो सुख दुःख का मिलाप भी
यूँ तो कहने को यह एक समस्या है
सच पूछो तो यह जिन्दगी एक तपस्या है।
जिन्दगी मांग है बलिदान भी
यूँ तो कहने को यह एक darpad bhi
सच पूछो तो जिन्दगी समर्पद भी
जिन्दगी चुनोती है vikharab bhi
यह एक sanghash है dahrav भी
यूँ तो कहने को यह एक nyauta है
सच पूछो तो जिन्दगी एक samjhauta है
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