Wednesday, May 29, 2013

दारू के इक गिलास में



चांद भी महबूबा लगता है,
दारू के इक गिलास में
सारा जग डूबा लगता है
दारू के इक गिलास में।

पतझड़ भी सावन लगता है
दारू के इक गिलास में
नाला भी पावन लगता है
दारू के इक गिलास में।

होश-ओ-हवास में मुझको तू
बे-वफा दिखाई देता है,
खुदा सा तू सच्चा लगता है
दारू के इक गिलास में।

बात-बात पर जिद करता
आंखों में आंसू भर लाता,
दिल छोटा बच्चा लगता है
दारू के इक गिलास में।

दोस्त कंपनी देने से
दिन-रात लगें जब कतराने
तब ‘साला’ अच्छा लगता है
दारू के इक गिलास में।

Monday, May 20, 2013

ताज और मुमताज




राग ताज का मत छेड़ो
मुमताज महल रो देती है
तुम अपनी प्रेम निशानी में
एक फूल गुलाबी दे देना
पत्थर को हीरे में जड़कर
मत खड़ी इमारत तुम करना
बस अपनी प्रेम कहानी में
किरदार नवाबी दे देना।।

ऊंची मीनारों पर मुझको
मुमताज दिखाई देती है
सूनापन उसको डंसता है
इक चीख सुनाई देती है
जब मैं तन्हा महसूस करूं
तुम इतना करना प्राणप्रिये
साकी बन जाना तुम मेरे
इक जाम शराबी दे देना।।

कब कहती थी ताज चाहिए
मुमताज प्यार के बदले में
 कहती थी बस प्यार चाहिए
मुमताज प्यार के बदले में
आंगन की छोटी बगिया में
तुम प्रेम पल्लवित कर देना
मैं पुष्प बनूं, तुम भंवरा बनकर
प्यार जवाबी दे देना।।

Saturday, May 11, 2013

क्या तुम मुझसे प्यार करोगे




‘‘नहीं मैं गिरधर की मीरा सी
जो तुझ पर सर्वस्व लुटाऊं
नहीं राम की मैं सीता सी
तेरे पीछे जग बिसराऊं
नहीं प्रेमिका राधा जैसी
श्याम रटूं, श्यामा हो जाऊं
नहीं रुक्मिणी हिम्मतवाली
लोक-लाज का भान न पाऊं
कलुषित चंचल मन है मेरा
इसको अंगीकार करोगे?
टूटा-फूटा प्रेम है मेरा
क्या तुम मुझसे प्यार करोगे?’’

Friday, May 10, 2013

साला एक मच्छर आदमी को......




बात कलियुग में विक्रत संवत 2070 की शुरुआत और सन् 2013 के मई माह की है। तारीख थी ‘11’। गर्मी की ऋतु बाल्यावस्था से किशोरावस्था को प्राप्त हो रही थी। यूं तो यमुना के तीर पर बसे बृज क्षेत्र में बिजली, पानी आदि अनेक कारणों से त्राहि-त्राहि मची हुई थी लेकिन एक अन्य  कारण, जिसके कारण लोगों का जीना दूभर हो चला था, वह था मच्छर। ‘साला एक मच्छर आदमी को .......बनाए हुए था।’ शहरवासियों ने मच्छरों को भगाने के कई हथकंडे अपनाए। रैकेट, कॉइल, क्रीम, हिट आदि अस्त्र-शस्त्रों का इस्तेमाल किया किंतु अदना सा मच्छर आदमी का रक्त चूसकर उसे बीमारियों की सौगात देने से बाज नहीं आ रहा था। कसाब जैसे राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लोग मच्छर से डंक का शिकार हो चुके थे। जब साम-दाम-दंड-भेद नीतियों से बात न बनी तो ‘दो टूक’ ब्लॉग को एक उपाय सूझा। ब्लॉग ने रातों-रात रणनीति बनाकर (राष्ट्रहित की सुरक्षा को देखते हुए इस रणनीति का खुलासा नहीं किया जा रहा) मच्छरों के सरदार को किडनैप कर लिया। हमारी टीम जानना चाहती थी कि आखिर ऐसी क्या वजह है कि साला एक मच्छर आदमी को......बना रहा है। पहले तो मच्छरों के सरदार ने इनकार किया लेकिन जब हमने ‘थर्ड डिग्री फॉगिंग’ का भय दिखाया तो मरता क्या न करता.....। वह हमें इंटरव्यू देने को तैयार हो गया। प्रस्तुत हैं उस इंटरव्यू के खास अंश-

दो टूक- सबसे पहले तो ये बताइए कि आपकी संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, क्या आपकी सरकार आपको जनसंख्या नियंत्रित करने के लिए नहीं कहती है? 
मच्छर सरदार- जी संख्या तो पहले भी उतनी ही थी, जितनी अब है....फर्क बस इतना है कि पहले हमारी लुगाइयां घरों में छिपी रहती थीं। एक दिन टीवी पर चिपकी कुछ मच्छर लुगाइयों ने महिला जागृति के कार्यक्रम देख लिए। फिर क्या था, बाकी सब मच्छरनियों को ऐसा पाठ पढ़ाया कि सब की सब बगावत पर उतर आईं। कहने लगीं कि इंसान को काटें हम, खून हम चूसें, बच्चे हम पैदा करें, क्रेडिट तुम ले जाओ.....बहुत ना इंसाफी है। वी वांट फ्रीडम। यही वजह है कि अब मच्छरनियां बाहर दिखाई देती हैं जिससे संख्या बढ़ी हुई नजर आती है।

दो टूक- इंसानों द्वारा तैयार किए गए मच्छर मारक उत्पादों का भी आप पर कोई असर नहीं हो रहा है, इसका क्या कारण है? 
मच्छर सरदार- जी हमारे पुरखे तो मर जाया करते थे, लेकिन ये जो नई जनरेशन आई है ना, बहुत होशियार है। कुछ नए मच्छरों ने तो ‘हर माहौल में खुद को कैसे एडजस्ट किया जाए’ इस सब्जेक्ट पर विलायत से पीजी कोर्स किया है। कैसा भी मच्छर मारक उत्पाद लेकर आइए, हमारे युवा साइंटिस्ट की टीम उसका तोड़ निकाल देती है। मच्छरों का मानना है कि इंसान को मूर्ख बनाना बहुत आसान है। मच्छर मारकों से प्रयोग से हम मच्छरों पर तो कोई असर नहीं होता लेकिन इंसान धीरे-धीरे पॉइजन ग्रहण करता रहता है। यानि जो हमारे लिए गड्डा खोदता है वही गड्डे में गिर जाता है।

दो टूक- आप लोग जब भी चाहें, जिसे भी चाहें काट लेते हैं, मौसम-बेमौसम बीमार कर देते हैं....क्या आपका धर्म आपको इस बात की इजाजत देता है? 
मच्छर सरदार- धर्म को बीच में मत लाइए जी। धर्म तो आपका भी कहता है कि मच्छर मारना नहीं चाहिए, पर आप तो हमारी जान के पीछे रात-दिन पड़े रहते हैं। वैसे भी इंसानों का खून इन दिनों हमें डाइजेस्ट नहीं हो रहा। बीते सप्ताह गर्मियों की छुट्टी में शहर घूमने आईं तीन मच्छरियों को उल्टी-दस्त की शिकायत हो गई थी। कह रहीं थी कि हमने तो टेस्ट चेंज करने के लिए ब्लड पीया था, हमें क्या पता था कि यहां के लोगों का ब्लड इतना इम्प्योर है।

दो टूक- कुछ माह पहले खबरों में आया था कि आपके एक साथी ने कसाब को डंक मारा था? इस बात में कितना दम है? 
मच्छर सरदार- अब वो बात जाने भी दो। काहे गढ़े मुर्दे उखाड़ रहे हैं। दरअसल हमारा एक साथी एमबीएस स्टूडेंट का खून चूस-चूस कर बखूबी सीख गया था कि मार्केटिंग कैसे की जाए। उसमे नेम और फेम के चक्कर में कसाब को काटा था। हालांकि हमने उसे बाद में डांटा भी कि ऐसी प्रसिद्धि भला किस काम की जो देश के‘भूतपूर्व दामाद’ को ही काट बैठे। हम देश का खून पीने में विश्वास रखते हैं, देश के मेहमानों का नहीं।
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दो टूक- अगर आपको इंसानों का पीछा छोड़ने का प्रस्ताव दिया जाए तो उसके बदले आपकी डिमांड क्या होगी
मच्छर- हम चाहते हैं कि हमारे लिए हर घर में अलग से मच्छरिस्तान बनवा दिया जाए। आप अपने पोंछे का पानी, सड़ा-गला कूड़ा मच्छरिस्तान में फेंक सकते हैं। हम वहां भिनभिनाते रहेंगे और खाते-पीते रहेंगे। सप्ताह में एक दिन घर का कोई भी सदस्य हमारी मच्छरनियों के लिए एक-दो मिलीग्राम ब्लड डोनेट कर दिया करें, बस.....।

दो टूक- शोध बताते हैं कि आप लोग दिन-ब-दिन ढीठ होते जा रहे हैं। आखिर आप ऐसा क्या खाते हैं जिससे आपकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती जा रही है?
मच्छर सरदार-ये सब आप लोगों का किया धरा है। सोचने वाली बात है कि जब आप लोग मल्टी विटामिन, एनर्जी बढ़ाने वाली दवाएं खाएंगे तो दवाएं खून में मिलेंगी। वही खून हम भी पीते हैं। यानि इनडायरेक्ट वे में आप हमें भी मल्टी विटामिन खिला रहे हैं। ऐसे में हम भला बीमार क्यों पढ़ें?

दो टूक- आपने अब तक  लाखों इंसानों का ब्लड टेस्ट किया है, कोई ऐसा व्यक्ति जिसका ब्लड टेस्ट करना आपकी ख्वाहिश हो..
मच्छर सरदार- जी हमने अब तक इंसानों का ब्लड टेस्ट किया है, अब नेताओं का करना चाहते हैं।

दो टूक- क्या आप अखबार के माध्यम से इंसानों को कोई संदेश देना चाहते हैं
मच्छर सरदार- हां जी, सुनने में आया है कि इंसानी वैज्ञानिक मच्छरों को शुक्राणु रहित बनाने की तैयारी में हैं ताकि धीरे-धीरे मच्छरों की संख्या कम हो जाए। हम ऐसे वैज्ञानिकों को बताना चाहते हैं कि ‘विक्की डोनर’ है ना....।

Saturday, May 4, 2013

हैप्पी वर्ल्ड लाफ्टर डे इन एडवांस



‘‘ गली हंसी रही है, मोहल्ला हंस रहा है। खामोशी हंस रही है, ‘हल्ला-गुल्ला’ हंस रहा है, देखो जी, गोदी का लल्ला हंस रहा है। लस्सी हंस रही है, रसगुल्ला हंस रहा है, तवे पर  लोट-पोट भल्ला हंस रहा है। दुकान हंस रही है, मकान हंस रहा है, नोट देख बनिए का गल्ला हंस रहा है। हाथों की चूड़ियां बिना वजह खिलखिला रही हैं, अंगुली में पहना हुआ छल्ला हंस रहा है, और तो और, सचिन का बल्ला हंस रहा है।’’