Thursday, December 20, 2012

अहसासों का पैबन्द




कल रात उधेड़ा था मैंने
तेरी यादों के लिहाफ पर लगा अहसासों का पैबन्द
एक-एक कर निकले थे जज्बातों के चीथड़े
कुछ गुस्से भरे गूदड़-गादड़ थे
कुछ मुस्कान लपेटी कतरनें...
तेरे जाने की टीस का दर्द भरा टांका
अनजाने में गुथ गया था उस रुई से
जिसमें लपेट रखा था तेरा पहला इजहार-ए-मुहब्बत,
पैबन्द की अधखुली सीमन से झांक रहे थे तेरे वादे,
 कहीं-कहीं मेरी ख्वाहिशों का रेशमी धागा भी था
इसी से सिलने की कोशिश की थी मैंने कई बार
हमारे कुतरे हुए रिश्ते को,
बड़ी मुश्किल से मिली थीं बिना गांठ वाले धागों की रीलें,
तेरी बेरुखी की सुई भी चुभी थी कई बार मेरे अंतस पर
उसी खून से मैंने पैबंद पर दी थीं लाल छींटें
...अब पैचवर्क करते-करते दुख गई हैं मेरी आंखें
उधड़न सिलते-सिलते मैं खुद फटती जा रही हूं
तलाश रही हूं तेरे भीतर वो दर्जी
जो कर दे रफ़ू रिश्ते के हर छेद को।

Sunday, December 16, 2012

टीवी दिलवा दो पतिदेव

















कब मांगा था मैंने तुमसे नौ लाख का हार,
एक छोटे से टीवी की बस थी मुझको दरकार।
कब कहती थी चांद-सितारे तोड़ के मांग सजाओ तुम,
यही कहा था मेरी खातिर एक टीवी ले आओ तुम।
मन ही मन तुम यही सोचते खुश रखता हूं बीवी को,
...मुझसे पूछो, तरस गई हूं एक छोटे से टीवी को।
तुमसे ज्यादा शाहरुख की यादों में खोई रहती हूं,
सुबह तलक अभिषेक के ही बिस्तर पर सोई रहती हूं।
मुझे पता है टीवी मेरे जीने का आधार नहीं,
पर समय से लड़ने को टीवी से, बड़ा कोई हथियार नहीं।
जब भी मन में दबे हुए भावों का ज्वार उमड़ता है,
तब होकर टीवी से प्रेरित आंखों के रस्ते गिरता है।
जब कभी जिंदगी की वीरानी मेरा उपहास उड़ाती है
तुम क्या जानो तब टीवी की, कितनी याद सताती है।
टीवी हंसता, हम हंसते हैं, वो रोता है हम रोते हैं
यही वजह है हर घर में, दो-चार तो टीवी होते हैं।
टीवी का नाटक जब जीवन के नाटक से जुड़ जाता है
दु:ख-सुख-चिंता फुर्र हो जाती, मन ही मन, मन मुस्काता है।
यूं तो बिसराने को हर गम, मैं ध्यान लगा लूं भगवन का
पर तीस बरस का काम नहीं, ये काम उमर जब पचपन का।
सो प्राणनाथ ये विनती है, ख्याल अगर है बीवी का,
टूटा-फूटा डिब्बा ला दो, जो दिखता हो बस टीवी सा...।

-प्रीति शर्मा