Tuesday, June 25, 2013

कुछ इस तरह भी....




आंखें कह रही आंसू से गिरने की मनाही है
अभी मंजर कहां देखा ये एक टुकड़ा तबाही है
संभालों पंख परवाजों, उड़ाने रद्द सब कर दो
नभ में कर रहा कोई अब दौरा हवाई है
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उसको क्या पड़ी है जो मेरे आंसू पिरोएगा
जिंदा लाश पर क्योंकर कोई आंखें भिगोएगा
तड़पती आह से राहत जिसे थी मिल रही यारों
नमक छिड़के बिना जख्मों पे, अब कैसे वो सोएगा
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ये तेरा है, वो मेरा है, चलो किस्सा खत्म कर दें
तेरी पहचान हो मुझसे, मुझे तुझमें हवन कर दें
दूरी रास्तों की है, तभी मंजिल पे पहुंचेगी
दिलों की दूरियां पहले दिल में ही दफन कर दें।।

Monday, June 17, 2013

तकिए अपने होते हैं



जिनके कंधों पर सिर रखकर
वो फूट-फूट कर रोते हैं
रिश्तों के मारे कहते हैं
बस तकिए अपने होते हैं!

मन की गांठें धीरे-धीरे
तकिए पर जाकर खुलती हंै
बिन साबुन के सब पीड़ाएं
तकिए पर जाकर धुलती हैं
वो पीते अश्कों का प्याला
आंखें साकी हो जाती हैं
देकर तकिए को दर्द सभी
आंखें अक्सर सो जाती हैं
आंसू की गर्मी से पिघले
सुरमें की कालिख ढोते हैं
रिश्तों के...........

गम के मारों को तकिया
मनमीत सरीखा लगता है
मन के तारों को छू जाता
संगीत सरीखा लगता है
सट जाते हैं हट जाते हैं
चादर के संग बंट जाते हैं
रिश्तों की खींचातानी में
जिनके तकिए फट जाते हैं
उनके दुखड़ों पर जग हंसता
जब भी वो नयन भिगोते हैं
रिश्तों के.............

Friday, June 14, 2013

नए जमाने के डैडी




कभी मां बन जाते हैं
कभी बन जाते हैं दादी
कुछ ऐसे हैं
नए जमाने के डैडी!

नहीं दिखाते आंख
बात-बात पर
परीक्षा में नहीं जगाते
रात-रात भर
दोस्त की तरह दे रहे साथ
नए जमाने के डैडी!

दुनिया के दांव-पेंच
खुद ही सिखा रहे हैं
उलझन से कैसे सुलझे
ये भी बता रहे हैं
बेटे का बायां हाथ
नए जमाने के डैडी!

सूसू करा रहे हैं
पॉटी धुला रहे हैं
बच्चा जरा भी रोया
जगकर सुला रहे हैं
दे रहे मां को मात
नए जमाने के डैडी!

आदर्श का लबादा
अब तो उतार फेंको
बच्चे बड़े हुए हैं
चश्मा हटा के देखो
समझा रहे ‘पिता’ को
नए जमाने के डैडी!