Sunday, February 24, 2013

तकिया कलाम को सलाम


लोगों के प्यार डिफरेंट-डिफरेंट टाइप के होते हैं। कोई कुत्ते, बिल्ली से प्यार करता है तो कोई महबूबा से। लेकिन, कुछ ऐसे भी शख्स होते हैं जिन्हें शब्दों से प्यार हो जाता है। ये शब्दों के साथ प्यार में इस कदर डूब जाते हैं कि चौबीस घंटे एक ही शब्द  की माला जपते रहते हैं। ..और धीरे-धीरे यह शब्द उनका तकिया कलाम बन जाता है। रोजमर्रा की बातचीत के दौरान वे अपनी लाइन की समाप्ति तकिया कलाम के साथ ही करते हैं। जिन लोगों के तकिया कलाम कुछ डिफरेंट टाइप के होते हैं, उन्हें सामाजिक मान्यता मिल जाती है और लोग उनके तकिया कलाम को महात्मा के वचनों की तरह फॉलो करने लगते हैं। उदाहरण के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने प्रचार के दौरान एक कैच वर्ड बहुत ज्यादा प्रयोग में लाते थे, यस वी कैन..(हां हम कर सकते हैं)। धीरे-धीरे यस वी कैन अमेरिकी लोगों के बीच इतना पॉपुलर हो गया कि वहां के लोग आमतौर पर बातचीत के दौरान कहने लगे, यस वी कैन।
वैसे तकिया कलाम का असली प्रोपराइटर कौन है, यह कहना थोड़ा मुश्किल है लेकिन काफी ढूंढ-ढांढने के बाद मिली थोड़ी बहुत जानकारी के मुताबिक तकिया कलाम की शुरुआत नारद जी ने की थी। चूंकि नारद जी के टाइम में न्यूज चैनल तो थे नहीं सो वे देवताओं, असुरों, ब्रह्मलोक, शिवलोक, विष्णुलोक के अलावा मृत्युलोक में खबरें इधर से उधर करने का काम किया करते थे। उन दिनों न्यूज का कोई स्पॉंसर न मिलने के कारण वे ब्रेक के दौरान नारायण-नारायण शब्द का उच्चारण किया करते थे। बस यहीं से शुरुआत हो गई तकिया कलाम की। तकिया कलाम के विचार को अमेरिका के कोई देवी-देवता न हथिया लें, यह सोच उन्होंने सर्वप्रथम इसका पेटेंट कराया। फलत: नारद मुनि जहां भी जाते, अपना तकिया कलाम साथ ले जाते। तकिया कलाम का दौर थोड़ा आगे और बढ़ा। मध्यकाल में अकबर बादशाह को मा-बदौलत का शौक चर्राया। वे हर बात के आगे-पीछे मा-बदौलत नामक शब्द जोड़ दिया करते थे। हालांकि बीरबल को इससे आॅब्जेक्शन होता था लेकिन वे बॉस के आगे कुछ बोलते नहीं थे। वैसे आज के जमाने में मा-बदौलत का अर्थ किसी सभ्य इंसान को गालीनुमा लग सकता है, इसलिए यह तकिया कलाम समय के साथ विलुप्त हो गया। बादशाह अकबर चले गए तो तकिया कलाम के साम्राज्य को और आगे बढ़ाने की बारी आई। एक-एक कर कई तकिया कलाम मार खां पैदा हो गए। अपनी सुविधा के अनुसार कोई एक शब्द चुन लिया और वाक्य के पीछे चस्पा कर दिया। कोई कहने लगा ‘जो है सो है’ तो किसी को ‘समझे के नहीं समझे’ कहने में मजा आने लगा। किसी का तकिया कलाम बना, ‘क्या कहते हैं’ तो कोई कहने लगा हां जी...। तकिया कलाम की दुनिया में जिन महान हस्ती का नाम सबसे ज्यादा लिया जाता है, उनका नाम है धमेंद्र। उनका फेवरेट तकिया कलाम है, कुत्ते कमीने मैं तेरा खून पी जाऊंगा...। यह तकिया कलाम लड़ाकू लोगों को बहुत पसंद आता है। वैसे हमारे देश में राहुल गांधी के पापा (स्व. राजीव गांधी) का तकिया कलाम भी वर्ल्ड फेमस रहा है, हम देख रहे हैं...हम देखेंगे। उनका तकिया कलाम उनकी पार्टी मुंह से बोलने के बजाय फॉलो कर रही है और देश में महंगाई की मार देख रही है। इसी तरह ‘हास्टा ला विस्टा, बेबी’ (अलविदा, बेबी) वाक्य हॉलीवुड अभीनेता अर्नोल्ड श्वार्जनेगर ने अपनी एक फिल्म में दुश्मनों को उड़ाते हुए यह कुछ ऐसे बोला के यह जुमला लोक संस्कृति का हिस्सा बन गया।

टीवी के हिट तकिया कलाम
- अररररररर- दक्षाबेन (क्योंकि सास भी कभी बहू थी, स्टार प्लस)
-कान्हा जी झूठ न बुलवाएं- चंदा (उतरन, कलर्स )
-ओह मां, माताजी- दयाबेन (तारक मेहता का उल्टा चश्मा, सब टीवी)
-जो होता है वो दिखता नहीं, जो दिखता है वो होता नहीं - केडी पाठक (अदालत, सोनी)
-जो बुरा न समझे, भला न समझे, वो कलावती को क्या समझे- कलावती(लागी तुझसे लगन, कलर्स)
- वाट लग जाएगी- प्रभु (डोर, स्टार प्लस)
- झूठ तो मैं बोलती नहीं- मालती (सपना बाबुल का बिदाई, स्टार प्लस)
- पापा कसम- बृज पांडेय (लापतागंज, सब टीवी)
- साफ कहो, सुखी रहो.....हंबे- इमरती देवी ( कैरी- रिश्ता खट्टा मीठा, कलर्स)
- राम ही राखे-नानीजी (उतरन, कलर्स)
- हैलो हाय, बाय-बाय- मनोरमा (इस प्यार को क्या नाम दूं)

क्यों हुई तकिया कलाम की उत्पत्ति
जिस तरह तकिया लगाने से सोना आसान हो जाता है उसी तरह तकिया कलाम लगाने से बोलना आसान हो जाता है। तकिया कलाम की उत्पत्ति के पीछे इसी टाइप की कोई सोच रही होगी। प्राचीन काल को छोड़ दिया जाए तो वर्तमान काल में कोई महान नेता अपनी स्पीच भूल गए होंगे। वे बीच-बीच में कुछ न कुछ शब्द जोड़ने लगे होंगे...या फिर कोई टीचर बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते चैप्टर भूल जाती होंगी और बीच-बीच में बच्चों से कहने लगती होंगी, आई बात समझ में। इसलिए पैदा हो गए तकिया कलाम।

Sunday, February 17, 2013

कैसा हो कलियुग का बसंत



वाऊ! इस बार बसंत पर कितना अनूठा दृश्य दिखाई दे रहा है। बर्फीली हवाएं। तड़ातड़ पड़ती बूंदे। मन में तो नहीं पर हां तन में सिहरन। कीचड़-खाचड़ से भरे बाग-बगीचे। टूटी सड़कों में धसते प्रेमी-प्रेमिकाओं के पैर। मानो धरती ने इस बार कुछ अनोखा ही रूप धारण कर लिया है। आखिर इस नए रूप का क्या कारण है और बसंत में बेवजह बारिश बरसने की ठोस वजह क्या है, यह जानने के लिए हमने स्वर्ग लोक को फोन मिलाया, वहां से जो जवाब आया....प्रस्तुत है। 

‘हैलो...हम दो टूक ब्लॉग से बोल रहे हैं। दरअसल हमें बसंत के बदले हुए रूप पर स्टोरी लिखनी है। क्या कामदेव सर से बात हो सकती है।’ हमारी बात कम्प्लीट होते ही उधर से आवाज आई... प्लीज होल्ड आॅन....रिसेप्शनिस्ट अप्सरा ने स्वर्ग के भीतर फोन ट्रांसफर कर दिया। फोन बसंत रितु के असिस्टेंट देव ने उठाया...। हां, बताइए क्या बात है...‘जी हमें कामदेव सर से बात करनी है...’...सर तो छुट्टी पर हैं, मुझे बताइए क्या बात है....‘सर छुट्टी पर हैं तो उनकी जगह बसंत रितु का डिर्पाटमेंट कौन देख रहा है...?’ आपको क्या काम है...? जी हमें स्टोरी लिखनी है....हमारे इतना कहते ही असिस्टेंट मैनेजर बोला, अच्छा आप कुछ मसाला तलाश रहे हैं...? जी नहीं....हमें बसंत के बदले हुए रूप के बारे में कुछ ठोस तथ्य प्रस्तुत करने हैं.....सो प्लीज आप हमारी बसंत के एचओडी से बात करा दीजिए.....। असिस्टेंट मैनेजर बोला, काम सर वेलेनटाइन डे के कारण दिन-रात जॉब पर थे। उन्होंने पिछले पंद्रह दिन से छुट्टी नहीं ली थी। इस वजह से उन्हें काफी थकान महसूस हो रही थी। अब वे कुछ दिन की छुट्टी पर चले गए हैं। चूंकि इन दिनों इंद्र सर खाली रहते हैं इसलिए उन्हें काम सर की जगह ड्यूटी पर लगाया गया है। आप उनसे ही बात कर लीजिए।...

हैलो इंद्रदेव जी...क्या आप हमें बताएंगे कि इस बार बसंत का यह रूप कुछ अलग-अलग सा क्यों दिखाई दे रहा है? क्या आप बसंत को किसी नई रितु में परिवर्तित करना चाहते हैं या आसमान में पानी का टैंकर लुढ़क गया है?
 इंद्रदेव....हे भद्रे! ऐसा नहीं है...। दरअसल हम जो कुछ भी कर रहे हैं सब कुछ कामदेव ने ही हमने करने के लिए कहा था। वे छुट्टी पर जाते-जाते हमको ‘छह सूत्रीय बासंती योजना’ लिखकर दे गए थे। हम उसी को अमलीजामा पहना रहे हैं। हो सकता है कि इस बदले हुए मौसम के पीछे विरोधियों का हाथ हो। यह भी हो सकता है कि रूस में उल्कापिंड गिरने से धरती पर बारिश हो रही हो। यह भी हो सकता है कि नर्कलोक में अफजल गुरू रो रहे हों।


 दो टूक - अच्छा तो इंद्रदेव आप बता सकते हैं कि वह छह सूत्रीय योजना क्या थी जो कामदेव ने आपको बताई थी।
इंद्रदेव- ‘पवन चलाना, बूंदों से मन को रिझाना
मौसम में हो परिर्वतन, खिले जाए तन और मन
प्रेम के तीर छोड़ना, दिल को दिल से जोड़ना’
कामदेव इन छह कामों को बड़े ही बोरिंग तरीके से हौले-हौले करते थे। मैंने सोचा कि क्यों न आज की फास्ट लाइफ में इन्हें फास्ट तरीके से अंजाम दिया जाए। और फिर मेरा वर्किंग कॉन्सेप्ट कामदेव के कॉन्सेप्ट से थोड़ा डिफरेंट है....जो भी करो फास्ट करो। डोंट बी स्लो। इसलिए मैंने स्पीड में बारिश की। हवा इतनी ठंडी चलाई कि लोगों के तन-मन दोनों खिल गए। उन्हें बसंत में सावन की याद आ गई। जब बारिश होगी और तेज हवा चलेगी तो नेचुरल है कि मन में पपीहा बोलने लगेगा। रोड पर पानी भर गया। लड़कियों की स्कूटी घिरघिराने लगी। लड़के हेल्प करने को आए....दिल से दिल जुड़ गए। अब इसमें मेरी क्या फॉल्ट है जो प्रेम के तीर से दिल से ईलू-ईलू की अवाज आने के बजाय  ‘बसंत में मार डाला’ की आवाज निकलने लगी।

 दो टूक - पर इंद्रदेव, ना कोयल कूक रही हैं ना पहीहा बोल रहा है। न आम की डाली बौराई है। क्या इस बारे में आपसे जवाब तलब नहीं किया गया?
इंद्रदेव-एक तो मैंने कामदेव का काम आसान किया, उस पर आप मुझ पर ही तोहमत लगा रहे हैं। आप तो ठीक वैसे ही सवाल कर रहे हैं जैसे भारत में हर विस्फोट के पीछे पाक आतंकवादियों का हाथ तलाशा जाता है।

 दो टूक - कहीं ऐसा तो नहीं कि धरती के बसंत पर किसी और ग्रह का मौसम डाका डालने की फिराक में हो। और उसने ऐसा करने के लिए आपको रिश्वत दी हो।
इंद्रदेव....डोंट निकाल बाल की खाल यानि बाल की खाल मत निकालिए। जो हमसे करने के लिए कहा गया, हमने वही किया। हमारे पास कौन ही बसंत की डिग्री है। अगली बार हमें इस सीट पर बिठाया गया तो शॉर्ट टर्म बासंती कोर्स करके आएंगे

 दो टूक - इंडियन सड़कें वैसे ही टूटी-फूटी हैं, उस पर बसंत की प्यारी-प्यारी रितु में कीचड़-खाचड़ किस उदद्ेश्य से की गई?

इंद्रदेव-ताकि प्रेमी-प्रेमिकाएं सड़क पर फिसल जाएं और गाना गाएं...आज रपट जाएं तो हमें ना उठइयो....। ....और फोन डिस्कनेक्ट हो गया।



Friday, February 8, 2013

शाहजहां की मॉडर्न लव स्टोरी



दुनिया भर के हाई प्रोफालइ प्रेमियों, लो प्रोफाइल लवर्स, मीडियम, सड़कछाप, आवारा मजनुओं से क्षमा मांगते हुए....हां तो जनाब अगर आज मुमताज महल जिंदा होती और शाहजहां और मुमताज की आंखें फरवरी के हॉट सीजन में चार होतीं तो क्या नजारा होता....। 
(बात पता नहीं कब की है चूंकि दिल से बनाई गई है इसलिए जब आपका मन हो तब की ही मानिए.....) 
शाहजहां के पास अकूत दौलत थी, सो उन्होंने दयालबाग या कमला नगर टाइप की किसी पॉश कॉलोनी में कई एकड़ जगह घेरकर अपन बंग्लो बनवा लिया था। मुमताज महल की अम्मी का घर ढोलीखार में था। (मान लीजिए)...। मुमताज महल अंग्रेजी की ट्यूशन लेने ढोलीखार से संजय प्लेस अपनी एक्टिवा पर आया करतीं थी। वेलेनटाइन की पूर्व संध्या पर शाहजहां का मन हुआ कि चलो सदर की सैर की जाए, देखा जाए कि फिजा में प्यार की कितनी महक मार रही है। दूसरी ओर मुम्स (मुमताज की सहेलियां प्यार से मुमताज को मुम्स कहकर बुलाती थीं) अपनी स्कूटी से अंग्रेजी के टीचर के लिए गुलाब खरीदने निकली थीं। अम्मी ने पैसे तो बेसन और मूंग की दाल लाने के लिए दिए थे पर मुम्स का पहला क्रश तो अंग्रेजी के टीचर ही थे ना। मुम्स ने सोचा कि वेलेनटाइन डे पर गुलाब का फूल बहुत महंगा मिलेगा सो एक दिन पहले ही खरीद लिया जाए। मुम्स को क्या पता था कि गुलाब का तो बहाना है दरअसल किस्मत को शाहजहां को मुमताज से मिलवाना है। आगे-आगे मुम्स की स्कूटी, पीछे-पीछे शाहजहां की बीएमडब्ल्यू....एमजीरोड के जाम को चीरते हुए दोनों बढ़े चले जा रहे थे सदर की तरफ। मुम्स को हेलमेट लगाने की आदत नहीं थी। उस दिन मुंह पर कपड़ा भी नहीं बांधा था... बाल गीले थे इसलिए चोटी नहीं बनाई थी। टॉप कुछ टाइट था लेकिन सोबर लग रहा था। जींस पर टैटू बना हुआ था। बहुत स्वीट लग रहीं थी उस दिन, इसलिए स्टाइल भी कुछ ज्यादा मार रहीं थी। फर्राटे से स्कूटी दौड़ाते हुए चली जा रही थी अपनी धुन में। तभी मुम्स को लगा कि स्कूटी कुछ प्रॉब्लम दे रही है। दरअसल उमसें पेट्रोल खत्म होने वाली थी। एक बारगी उनकी स्कूटी बीएमडब्ल्यू से टकराते-टकराते रह गई, शाहजहां पहले तो कुछ नहीं बोले लेकिन जब स्कूटी दूसरी बार टकराई तो शाहजहां से नहीं रहा गया, वे गाड़ी का शीशा उतारते हुए बोले, ‘मोहतरमा, ठीक से स्कूटी चलाइए।’ तभी स्कूटी बीएमडब्ल्यू की हैडलाइट से जा टकराई। शाहजहां का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया, वे बंद शीशे में से ही चीखे, गुस्ताख लड़की, देखती नहीं तूने क्या कर दिया। गाड़ी का इंश्योरेंस भी नहीं है....। दूसरी तरफ मुम्स एक्टिवा खराब होने के कारण आॅफ मूड में थी, शाहजहां का गुस्सा उन्हें बर्दाश्त नहीं हुआ। वे एक्टिवा से उतरीं और शाहजहां पर दहाड़ीं, अमीरजादे....ये सड़क तुम्हारे अब्बू ने नहीं बनवाई है...। हिम्मत है तो बाहर आकर बात करो...। शाहजहां बाहर निकले...मुम्म भी एक्टिवा से उतरीं, दोनों की आंखें चार हुईं.....बगल वाली दुकान में जोर-जोर से गाना बज रहा था....‘उनसे मिली नजर कि मेरे होश उड़ गए’, मुम्स में अचानक से नजाकत आ गई, वे बोलीं, हाय अल्लाह! ऐसे क्या देख रहे हो...। तभी शाहजहां के मोबाइल की रिंगटोन बजी, ‘पहली-पहली बार जब प्यार किसी से होता है..’, दोनों एक दूसरे को देख ही रहे थे कि तभी रोडसाइड भिखारी आकर शाहजहां से बोला, ‘भगवान दोनों की जोड़ी को सलामत रखे, दो रुपया दे दे बाबा।’ शाहजहां किसी भिखारी की कहां सुनने वाले थे। वे तो मुमताज के प्यार में भिखारी बन गए थे जो सरेराह प्यार की भीख मांग रहे थे। कुछ ही देर में रोड के चारों तरफ भीड़ इकट्ठी हो गई। फॉरनर्स ने सोचा कोई इंडियन तमाशा है इसलिए रोड पर पैसे फेंकना शुरू कर दिया। किसी ने बजरंग दल वालों को फोन कर दिया कि दो प्रेमी सदर में बीचों-बीच प्यार की पींगे बढ़ा रहे हैं जरूर विरोधी दल ने खेल खेला है। फिर क्या था, पहुंच गए डंडा लेकर। माजरा बढ़ता देख ट्रैफिक पुलिस आई और गुर्राई, अबे ओ....लड़की को रोड पर छेड़ता है, तुझे पता नहीं इन दिनों लड़कियों को छेड़ना कितना सेंसेटिव इश्यू है। किसी तरह मामला सुलटा और शाहजहां ने मुमताज को लिफ्ट देने के बहाने गाड़ी में बैठा लिया। गाड़ी का ड्राइवर भी कम शातिर थोड़े ही था, मुम्स के गाड़ी में बैठते ही बोला, ‘भाभी जी जब तक है जान के गाने चला दूं।’ मुमताज शर्मा कर रह गईं। यहीं से शुरुआत हो गई शाहजहां और मुमताज की प्रेम कहानी की।
गिफ्ट जो शाहजहां ने मुमताज को दिए

- लाल गुलाब से भरा गार्डन।
- मुमताज के नाम का मल्टीप्लेस जिसमें शाहजहां मुमताज की लव स्टोरी ही चला करती थी।
- रोड का नामकरण मुमताज के नाम पर हुआ।
- मुमताज के नाम पर शॉपिंग मॉल जिसमें लवर्स को चॉकलेट्स, गिफ्ट्स, टैडी बियर्स पर डिस्काउंट मिलता था।
- राजीव शर्मा ‘राज’

Tuesday, February 5, 2013

मुहब्बत का तजुर्बा



खुद को बर्बाद करने का तजुर्बा हमसे कोई सीखे
जिंदगी खाक करने का तजुर्बा हमसे कोई सीखे
मुहब्बत की है मैंने जानता हर शख्स बस्ती का
मगर अंदाज क्या हो, ये तजुर्बा हमसे कोई सीखे
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नहीं आसान उसका रहनुमाई यूं ही कर देना
खुदा की सी खुदाई यूं ही कर देना
कि रोये कई दफा हैं वो सनम के दर पे जी भरके
मगर फरियाद क्या हो, ये तजुर्बा हमसे कोई सीखे
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सुना है तुमने भी, मैंने भी, उसने और इसने भी
मुहब्बत से बड़ा कोई सितम वो दे नहीं सकता
ये दरिया आग का है डूबकर तो सब ही जाते हैं
मगर जज्बात क्या हों, ये तजुर्बा हमसे कोई सीखे

- राजीव शर्मा ‘राज’