Tuesday, July 31, 2012

झूठ बराबर तप नहीं, सांच बराबर पाप


झूठ बराबर तप नहीं, सांच बराबर पाप
जाके हृदय सांच है, बैठा-बैठा टाप
बैठा-बैठा टाप, देख लो लाला झूठा
सत्यमेव जयते को दिखला रहा अगूंठा
कह काका कवि इसके सिवा उपाय न दूजा
जैसा पाओ पात्र करो वैसी ही पूजा
काका हाथरसी
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सारे जहां से अच्छा है इंडिया हमारा
हम भेड़-बकरी इसके यह ग्वारिया हमारा

सत्ता की खुमारी में, आजादी सो रही है
हड़ताल क्यों है इसकी पड़ताल हो रही है
लेकर के कर्ज खाओ यह फर्ज है तुम्हारा
सारे जहां से अच्छा है इंडिया हमारा
चोरों व घूसखोरों पर नोट बरसते हैं
ईमान के मुसाफिर राशन को तरसते हैं
वोटर से वोट लेकर वे कर गए किनारा
सारे जहां से अच्छा है इंडिया हमारा
जब अंतरात्मा का मिलता है हुक्म काका
तब राष्ट्रीय पूंजी पर वे डालते हैं डाका
इनकम बहुत ही कम है होता नहीं गुजारा
सारे जहां से अच्छा है इंडिया हमारा
हिन्दी के भक्त हैं हम, जनता को यह जताते
लेकिन सुपुत्र अपना कॉन्वेंट में पढ़ाते
बन जाएगा कलक्टर देगा हमें सहारा
सारे जहां से अच्छा है इंडिया हमारा
फिल्मों पे फिदा लड़के, फैशन पे फिदा लड़की
मजबूर मम्मी-पापा, पॉकिट में भारी कड़की
बॉबी को देखा जबसे बाबू हुए अवारा
सारे जहां से अच्छा है इंडिया हमारा
जेवर उड़ा के बेटा, मुम्बई को भागता है
जीरो है किंतु खुद को हीरो से नापता है
स्टूडियो में घुसने पर गोरखा ने मारा
सारे जहां से अच्छा है इंडिया हमारा
- काका हाथरसी


तोंद की माया
खान-पान की कृपा से तोंद हो गई गोल
रोगी खाते औषधि, लड्डू खाएं किलोल
लड्डू खाएं किलोल, जपें खाने की माला
ऊंची रिश्वत खाते, ऊंचे अफसर आला
दादा टाइप छात्र मास्टरों का सिर खाते
लेखक की रॉयल्टी, चतुर पब्लिशर खाते
दर्प खाय इंसान को, खाय सर्प को मोर
हवा जेल की खा रहे, कातिल-डाकू-चोर,
कातिल-डाकू-चोर, ब्लैक खाएं भ्रष्टाजी,
बैंक-बौहरे-वाणिक, ब्याज खाने में राजी,
दीन-दुखी-दुर्बल, बेचारे गम खाते हैं
न्यायालय में बेईमान कसम खाते हैं
सास खा रही बहू को घास खा रही गाय,
चली बिलाई हज्ज को, नौ सौ चूहे खाय,
नौ सौ चूहे खाय, मार अपराधी खाएं
पिटते-पिटते कोतवाल की हा-हा खाएं,
उत्पाती बच्चे, चच्चे के थप्पड़ खाते,
छेड़छाड़ में नकली मजनूं, चप्पल खाते...
सूरदास जी मार्ग में ठोकर-टक्कर खाय
मंत्री चक्कर खाय, टिकट तिकड़म से लाय
इलेक्शन में हार जाएं तो मुंह की खाएं
जीजाजी खाते देख साली की गाली,
पति के कान खा रही झगड़ालू घरवाली....
मंदिर जाकर भक्तगण, खाते प्रभु प्रसाद,
चुगली खाकर आ रहा चुगलखोर को स्वाद,
चुगलखोर को स्वाद, देंय साहब परमीशन,
कॉन्ट्रेक्टर से इंजीनियर जी खाएं कमीशन
अनुभवहीन व्यक्ति दर-दर की ठोकर खाते,
बच्चों की फटकारें बूढ़े होकर खाते
दद्दा खाएं दहेज में दो नंबर के नोट
पाखंडी मेवा चरें, पंडित चाटें होठ,
पंडित चाटें होठ, वोट खाते हैं नेता
खाय मुनाफा उच्च, निम्न राशन विक्रेता
काफी मैके कई, रेल में खाकर धक्का,
काका स्वयं बनाकर खाते कच्चा पक्का...।
-काका हाथरसी


घूस माहात्म्य
कभी घूस खाई नहीं, किया न भ्रष्टाचार
ऐसे भोंदू जीव को बार-बार धिक्कार
बार-बार धिक्कार, व्यर्थ है वह व्यापारी
माल तोलते समय न जिसने डंडी मारी
कह काका क्या नाम पाएगा ऐसा बंदा
जिसे किसी संस्था का न पचाया चंदा
- काका हाथरसी



पेट्रोल डालकर मर भी नहीं सकते!!!


   

बेड़ा गर्क हो जाए पेट्रोल के दाम बढ़ाने वालों का। आजकल की बहुओं को जलकर मरना भी नसीब नहीं। ससुरा कैरोसीन तो घर में मिलता नहीं, सोचती थीं कि चलो...पेट्रोल तो है। जैसे ही सास ने सब्जी की बुराई की, तुरंत बाइक में से पेट्रोल निकालेंगी और.....दो-चार बूंद अपने ऊपर स्प्रे करके मरने का एक्ट करेंगी। लेकिन.....पेट्रोल के रेट रोज-रोज बढ़ने पर पतियों ने साफ इंस्ट्रक्शन दे दिए हैं, मरना है तो कोई दूसरा प्लान बनाओ...पेट्रोल इस तरह वेस्ट करने की जरूरत नहीं। बगल वाली रूबी का तो रो-रो कर हाल बेहाल है। कहती है कि आए दिन पति ताने देते रहते हैं,... ये पेट्रोल तुम दहेज में नहीं लेकर आई हो, जो इस तरह खर्च करती रहती हो....।
खैर....जीना-मरना तो तेल कंपनियों के हाथ में है। किसी दिन तो मॉडर्न बहुओं की पुकार उनके कानों में गूंजेगी और पेट्रोल के दाम घटेंगे। तब तक हम आपको पेट्रोल पर मिनी स्टोरी सुनाते हैं। एक बार की बात है।
वन्स अपॉॅन ए टाइम देयर वाज ए पेट्रोल नामक तरल पदार्थ। जिसे पीकर स्कूटर की टंकियां हमेशा छक्क रहती थीं। मरा...जिस दिन टैंक फुल कराते, उस दिन ओवर फ्लो जरूर होता था। घंटे भर तक स्कूटर को घिर्र-घिर्र करते रहते, तब कहीं जाकर वह स्टार्ट होता। (अब ओवर फ्लो की बात छोड़िए, मीटर की सुई हमेशा रिजर्व पर अटकी रहती है।)
दादी-बाबा बताते हैं कि पेट्रोल पंप पर अगर कोई व्यक्ति सौ-दो सौ रुपये का पेट्रोल डलवाता तो आसपास खड़े लोग उसे अंबानी परिवार का होने वाला दामाद वगैरा समझने लगते। वो दिन भी क्या दिन थे। शीतल पेय से सस्ता पेट्रोल था। घरवाली को घुमाओ या बाहरवाली को, पेट्रोल किसी तरह का कोई व्यवधान नहीं डालता था। बारिश के नाम पर दो बूंद टपकते ही लोग लांग ड्राइव के लिए निकल पड़ते। (मिनी स्टोरी कम्प्लीट) पर अब.........क्या बताएं जनाब...। चार पहिए की गाड़ी जबसे ली है तब से आधी तनख्वाह पेट्रोल पी रही है। बच्चों से पहले ही तय कर लिया है कि या तो गाड़ी में घूम लो या फिर बाहर खाना खा लो। महीने में सिर्फ एक दिन आॅफिस गाड़ी ले जाता हूं। जब भी गेट खोलता हूं, गाड़ी मुझे ऐसी निकृष्ट निगाहों से देखती है मानो कहना चाह रही हो..... हे प्रभु मुझे इस गरीब के पल्ले ही बांधना था। ... काश मेरी चोरी हो जाए और ऐसा व्यक्ति मुझे चुराए जिसके पास पेट्रोल डलवाने के लिए पर्याप्त ऊपरी कमाई हो।... कहने को तो बहुत कुछ है। थोड़ा लिखे को बहुत जानना। चलते-चलते कबीरदास जी के दोहे का ‘पेट्रोल रूपांतरणत’-
जब पेट्रोल था तब गाड़ी नहीं, अब गाड़ी है पेट्रोल नाहि
यूं तो साइकिल घर में ठाड़ी है, पर स्टैंडर्ड देत घटाहि