Tuesday, April 23, 2013

संपूर्ण



क्या यही है तुम्हारा पौरुष
यही है हकीकत
इसी दर्प में जी रहे हो तुम
कि हर रात जीतते हो तुम
हार जाती हूं मैं
फिर सुकून भरी नींद लेते हो तुम
सिसकती हूं मैं
जीतना मैं भी चाहती हूं,
सुकून भरी नींद
मेरी आंखों को भी प्यारी है
पर फर्क है, तुम्हारी जीत और मेरी जीत में
घंटों निहारना चाहती हूं तुम्हें
एक निश्चल बच्चे की तरह
सुनाना चाहती दिन भर की बातें
नहीं चाहिए मुझे जड़ाऊ गहने
बस एक बार, एक बार
प्यार से मुस्कुरा दो मेरी किसी नाराजी पर
आॅफिस से लौटते में
कभी लेते आओ महकता गजरा
फिर कैसी खुमारी से भर उठेगा
तन और मन,
अब तक आधा पूर्ण किया है तुमने मुझे
संपूर्णता की परिधि में तन के साथ मन भी शामिल है
बस एक बार,
एक बार बना दो मुझे भी पूर्ण,
जीत जाने दो मुझे भी..
क्योंकि मेरी जीत बिना तुम्हारी जीत कहां
तुम्हारा अस्तित्व मुझसे ही तो संभव है
क्योंकि सिर्फ पत्नी नहीं हूं तुम्हारी
प्रिया हूं, अर्धांगिनी हूं, रचयिता हूं.....

9 comments:

Yashwant Mathur said...

आपने लिखा....हमने पढ़ा
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए कल 25/04/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
धन्यवाद!

Manav Mehta 'मन' said...

bhavpooran

चांदनी (निरुपमा) said...

बहुत खूब.

Anju (Anu) Chaudhary said...

बहुत खूब भावपूर्ण अभिव्यक्ति

Rajeev Sharma said...

manav ji, chandni ji, anju ji, aap sabhi ka bahut-bahut dhanyawaad..

Rajeev Sharma said...

manav ji, chandni ji, anju ji, aap sabhi ka bahut-bahut dhanyawaad..

khula asmaan said...

kya baat hai sir..

khula asmaan said...

kya baat hai sir.

khula asmaan said...

kya baat hai sir..