Sunday, February 21, 2010

झांकी एक अखबार की

आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी एक अखबार की
कलमों के सिपाही की और खबरों के संसार की,
पक्के बेशरम, हम पक्के बेशरम......

जो ज्यादा सौदा (खबरें) लाता है, कम वेतन वो पाता है,
जो चिकनी-चुपड़ी करता है, वही चीफ बन जाता है,
नेट से चोरी करने वाला अप-टू-डेट कहलाता है,
संपादक भी अपनी खबरें ठेके पर लिखवाता है,
प्रेस कान्फ्रेंस में मिलने वाले गिफ्टों की बहार की,
कलमों के सिपाही की और खबरों के संसार की,
कारीगर हैं हम, कारीगर हैं हम....

न्यूज फेक हो फरक नहीं पर पता नहीं ये लग पाए,
कांट-छांट लो, टीप-टाप लो, खबर एक्सक्लूसिव बन जाए,
खबरों से ज्यादा विजापन पत्रकार लेकर आए
डोंट वरी तब खबर फ्रंट की मिस होती हो...हो जाए,
चाय के प्यालों में डूबी बाईलाइन के बहार की,
कलमों के सिपाही की और खबरों के संसार की,
तनख्वाह अपनी कम, तनख्वाह अपनी कम...

चौथा स्तंभ रोता है, बोझा अपना ढोता है,
इस धंधे में आने वाला खुशियां अपनी खोता है
उल्लू बनकर जागे राते में, देर तलक फिर सोता है,
बीज दुखों के जीवन भर अपने हाथों बोता है,
दुखियारों की, खिसियायों की, मजबूरों की, लाचार की,
कलमों के सिपाही की और खबरों के संसार की,
बुरे फंस गए हम, बुरे फंस गए हम।।

2 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

खूब बखिया उधेड़ी है.

निर्मला कपिला said...

बीज दुखों के जीवन भर अपने हाथों बोता है,
दुखियारों की, खिसियायों की, मजबूरों की, लाचार की,
कलमों के सिपाही की और खबरों के संसार की,
बुरे फंस गए हम, बुरे फंस गए हम।।
लेखकों की त्रास्दी पर अच्छी कविता है धन्यवाद्