Monday, June 17, 2013

तकिए अपने होते हैं



जिनके कंधों पर सिर रखकर
वो फूट-फूट कर रोते हैं
रिश्तों के मारे कहते हैं
बस तकिए अपने होते हैं!

मन की गांठें धीरे-धीरे
तकिए पर जाकर खुलती हंै
बिन साबुन के सब पीड़ाएं
तकिए पर जाकर धुलती हैं
वो पीते अश्कों का प्याला
आंखें साकी हो जाती हैं
देकर तकिए को दर्द सभी
आंखें अक्सर सो जाती हैं
आंसू की गर्मी से पिघले
सुरमें की कालिख ढोते हैं
रिश्तों के...........

गम के मारों को तकिया
मनमीत सरीखा लगता है
मन के तारों को छू जाता
संगीत सरीखा लगता है
सट जाते हैं हट जाते हैं
चादर के संग बंट जाते हैं
रिश्तों की खींचातानी में
जिनके तकिए फट जाते हैं
उनके दुखड़ों पर जग हंसता
जब भी वो नयन भिगोते हैं
रिश्तों के.............

3 comments:

Yashwant Mathur said...

आपने लिखा....हमने पढ़ा
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए आज 19/06/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
आप भी देख लीजिए एक नज़र ....
धन्यवाद!

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन भाव ... बहुत सुंदर रचना प्रभावशाली प्रस्तुति

संजय भास्‍कर said...

प्रशंसनीय रचना - बधाई
शब्दों की मुस्कुराहट पर ….माँ तुम्हारे लिए हर पंक्ति छोटी है

शब्दों की मुस्कुराहट पर ….सुख दुःख इसी का नाम जिंदगी है :)