Saturday, March 16, 2013

तुम कब रंग लगाओगे




अंबर ने मारी पिचकारी
भीगी धरती की साड़ी
प्रत्युत्तर में धरती ने भी
जमकर के दीन्ही गारी
बैठ झितिज रंगों को घोला
भूली मरजादा सारी
बरजोरी जब होने लागी
नभ ने चुनर दी फाड़ी
भीगा चितवन, भीगा यौवन
तुम कब मुझे भिगाओगे
बीती जाती रुत फागुन की
तुम कब रंग लगाओगे....
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भंवरा भी बौराय गया है
देख कली की अंगड़ाई
गुंजन करके कहने लगा
आई सखी होली आई
पान किया मकरंद भ्रमर ने
कली पे छाई तरुणाई
आलिंगन करने भंवरे का
पवन के संग दौड़ी आई
बेकल है मन, बेसुध है तन
तुम कब अंग लगाओगे
बीती जाती रुत फागुन की
तुम कब रंग लगाओगे.....
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छेड़ रही है शिव को शिवा फिर
दूर भाग शरमाई है
फाग ऋतु की देख खुमारी
शिव ने भांग चढ़ाई है
राधा भी कान्हा को रंगने
बरसाने से आई है
माखन की मटकी में छुपाके
प्रेम रंग भर लाई है
सब ही होली खेलें मिलकर
तुम कब मिलने आओगे
बीती जाती रुत फागुन की
तुम कब रंग लगाओगे....

2 comments:

rohitash kumar said...

अभी के अभी होली खेल लिया हमने तो

priti said...

happy holi sir in advance.....