Sunday, November 4, 2012

खील की खिल्ली



दीए सज गए, झालर सज गई
सज गए चकई, अनार
खील बेचारी सोच रही
मुझे नहीं किया तैयार
नहीं किया तैयार कि मैं हूं हल्की-फुल्की
जैसी बॉलीवुड की हीरोइन है ‘कल्कि’
कह ‘फन डे महाराज’ खील से कैसी रुसवाई
क्यों मॉडर्न दुनिया ने खील की खिल्ली उड़ाई


‘डोंट माइंड देवियों और सज्जनों लेकिन ‘खील मैया’ ने इस दीवाली पर रौद्र रूप धारण कर लिया है। धान में निकलते समय इतनी तेज आवाज कर रही है मानो किसी के स्कूटर का साइलेंसर फट गया हो। चीखते हुए कह रही हैं एक-एक को देख लूंगी। खासतौर से नए जमाने के छोरे-छोरियों को। काली-काली चॉकलेट के आगे मुझ गोरी-चिट्टी स्लिम-ट्रिम खील को भूल गए। ‘व्हाट ए कलियुग सर जी।’

तो चलिए साहब बैठे-बैठे क्या करें करना है कुछ काम, शुरू करें ‘खील-पुराण’ लेकर दीवाली का नाम। ...सालों पहले की बात है। बाजार में खील नामक एक नन्ही-मुन्नी-सी वस्तु रहा करती थी। दीवाली का त्योहार आते ही इसकी बांछें खिल जाया करती थीं और मन बल्लियों उछलने लगता था। इसका मन बल्लियों न उछले इसके लिए दुकानदार खील के ढेर के चारों ओर बल्लियां लगा दिया करते थे, लेकिन फिर भी हवा का झोंका आते ही मन बल्लियों को पार कर उछल जाया करता था। कितनी हैप्पी-हैप्पी हुआ करती थीं ये उन दिनों। इनकी डिमांड इस कदर थी मानो ये उन दिनों की कैटरीना कैफ हों। हर कोई इन्हें अपने थैले में भरने के लिए आतुर रहता था। अपनी डिमांड को देखते हुए ये अपने प्राइस डबल-ट्रिपल कर देती थीं पर फिर भी दीवाली पर मोस्ट सेलेबल ‘आयटम’ हुआ करती थीं। हर बाजार में, हर दुकान पर खील का बोलबाला हुआ करता था। तब दो ही चीज दीवाली पर लोग पसंद करते थे, दिन में खीर, रात में खील। पर मुआ नया जमाना जब से आया है, खील का दिल चीर कर रख दिया है। थैले की बात छोड़िए थैलियों में भी खील खरीदने में भी लोग संकोच करने लगे हैं। अब चूंकि दीवाली पर लक्ष्मी-गणेश का पूजन खील से ही किया जाता है, अत: औपचारिकतावश महज इतने पीस खरीदते हैं कि चार-पांच लक्ष्मी जी के मुंह से चिपक जाएं और चार-पांच गणेश जी के मुंह पर। हो गई जै राम जी की। इस जमाने के मॉडर्नियाने के चक्कर में पुराने लोगों को भी खील के स्वाद से महरूम रहना पड़ रहा है। 100-200 ग्राम खील लेकर आते हैं। पूजा के बाद अगर खील बच जाती हैं तो उन्हें भी भगवान जी के हवाले कर दिया जाता है और अगर फिर भी खील बच जाएं तो उनका हश्र ‘बेगानी शादी में अबदुल्ला दीवाना’ जैसा हो जाता है। श्रीमती जी उन्हें घर के किसी डिब्बे में जगह नहीं देती हैं, ऊपर से चार डायलॉग और सुना देती हैं। इतनी खील क्यों ले लाए....? कहा था कि बस पूजा के लिए लेकर आना। तुम्हें तो पैसे खर्च करने का शौक है। कहां रखूं इन्हें..। (चार डायलॉग खत्म)। स्थान के अभाव में खील इधर से उधर डोलती रहती हैं। अंतत: चुहिया के पेट में जाकर उसकी दीवाली मना देती हैं।

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