Saturday, July 28, 2012

लगे रहो अन्नाभाई



ामलीला मैदान पर जरूर राम ने कोई न कोई लीला की होगी, सो आंदोलन सुपर-डुपर हिट हो गया। भाई लोगों ने सोचा कि जंतर-मंतर पर भी किसी देवी-देवता द्वारा तंत्र फूंक दिया जाएगा लेकिन यहां आंदोलन में ऐसा अंतर आया कि भीड़ छू मंतर हो गई। हमने तो पहले ही मना किया था कि जनाब पब्लिक का टाइम बहुत कीमती है। पिछली दफा भ्रष्टाचार भगाने के चक्कर में भाई लोग ईएल, सीएल, मेडिकल लीव, वीकली, मंथली, ईयरली तमाम प्रकार की छुट्टियां लेकर मैदान पर डटे रहे, भ्रष्टाचार तो भागा नहीं, छुट्टियों का कोटा खत्म हो गया। न लीव एनकैश हो पाईं, न बच्चे गर्मियों की छुट्टी में कुल्लू-मनाली जा पाए। बीवी ने भी ताने मार-मारकर जीना मुहाल कर दिया, घंटो तक मैदान पर बैठे-बैठे ऊंघने के लिए तुम्हारे पास टाइम है, मैं जरा बाजार जाने के लिए कहूं तो आसमान सिर पर उठा लेते हो।.....अरे अन्ना बनना है तो दे दो मुझे तलाक...। अन्ना के न बीवी है, न बच्चे। ये काम ठलुओं के होते हैं। अन्ना अकेली जान हैं, उन्हें कौन से बच्चे का एडमीशन कराना है, उन्हें कौन सा नगर निगम से बर्थ सर्टिफिकेट निकलवाना है। उनकी बला से  हमारा बच्चे डोनेशन के चक्कर अच्छे स्कूल में  पढ़ने से रह जाए तो रह जाए, उनकी तो उमर हो गई। बच्चे की तो पूरी जिंदगी पड़ी है। भ्रष्टाचार खत्म करना है तो पहले घर से शुरुआत करो, मैं सारा दिन काम करती रहती हूं, तुम्हारी मां सींक नहीं खिसकातीं, ये भ्रष्टाचार नहीं है। लो भइया...हो गई घर-घर में महाभारत।लेटेस्ट आॅर्गनाइज्ड आंदोलन के दौरान महाभारत वाला पार्ट दोबारा प्ले न होने पाए...इसके लिए पतिदेव पहले से ही एलर्ट थे। एक्चुली दूध का जला छाछ भी फूंक फूंककर पीता है। सो काहे फोकट में बैठकर तनख्वाह कटवाई जाए। ऊपर से रक्षाबंधन सिर पर है। बहनों को साल में एक बार ही तो मौका मिलता है जब भाभी के कलेजे पर सांप लोटाकर भैया के पैसे अपने बटुए के हवाले करती हैं। सो भैया मेरे राखी के बंधन को निभाने के लिए इन दिनों ओवरटाइम भी जरूरी है।भाई लोगों का क्या है, मौका देखकर मौसम-बे मौसम वायरल फीवर की तरह चार दिन चढ़ते हैं और वायदों की एंटीबायटिक खाते ही महीने-दो महीने के लिए रियाटर हो जाते हैं। और फिर अन्ना की तमन्ना के अलावा मुद्दे और भी हैं, जैसे राजेश खन्ना। खैर...हमें क्या, हम तो फुल टाइम भ्रष्टाचारी थे, भ्रष्टाचारी हैं, भ्रष्टाचारी रहेंगे। जब सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का...। अंत में मोरल आॅफ द स्टोरी, ‘‘जब (रिश्वत) खाने-खिलाने वाला राजी तो बीच में क्यों मार रहे हो भांजी।’’ 

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